किसान आंदोलन की वजह

kisan movement

किसानो के दिल्ली में एंटर होने पर पुलिस ने ना जाने कितने ही हतकंडे अपनाये , ना सिर्फ रोडस को सड़को को ब्लॉक किया गया बल्कि किसानो के आगे बढ़ने पर आंसू गैस के गोले भी फेके गए, सिर्फ इतना ही नहीं किसानो के साथ दुर्व्यवहार और गलत सुलूक भी किया गया, ये देख किसानो के भी सब्र का बाँध टूट गया और किसानो ने भी पुलिस पर चढ़ाई कर दी। पुलिस प्रशासन पर पथराव हुआ और इसी झड़प में शुभकरण सिंह की मौत हो गयी ,मौत का शोक जताने के लिए किसानो ने इस दिन को ब्लैक डे के रुप में मनाया और इसी बीच कुछ किसानो की भी मौत हो गयी लेकिन ये सब हो क्यों रहा हैं ? आखिर वो कौनसी वजह कौनसी दिक्कतें हैं जिनके कारण किसानो को अपना घर बार छोड़ सड़को पर धरना देना पड़ रहा हैं ?सरकार ने वो कौनसा वादा किया था जो अब तक पूरा नहीं हुआ ? चलिए जानते हैं इस पूरे मुद्दे को।

किसान आंदोलन आज देश का एक बड़ा मुद्दा बना हुआ हैं और इस बढ़ती आग को रोकना बहुत मुश्किल हो गया हैं लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ हैं जब किसान ने सड़को पर उतरकर भारत सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा ज़ाहिर किया हो बल्कि साल 2024 से पहले भी किसानो का ये घातक रूप देखने को मिला था और वो साल था 2020, जब किसान सरकार के खिलाफ आंदोलन पर उतर आये थे लेकिन सरकार के एक फैसले से ये सब शांत हो गए और अपने अपने घरों को रवाना हो गए ,लेकिन आज वहीँ शान्ति देश को अशांति से भर रही हैं, जी हां साल 2024 के आंदोलन की कड़ी साल 2020  के आंदोलन से ही जुडी हुई हैं लेकिन कैसे वो आपको बताते हैं

तारिख थी 5 जून 2020, जब भारत सरकार की तरफ से तीन बिल पेश किये गए , जिनमें पहला था कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य ,इस कानून के तहत किसानो को अधिकार दिया गया था की वो अपनी फसलों को सरकार को ना बेचकर किसी भी दुकानदार, व्यक्ति , संस्था को बेच सकते हैं और अपनी फसलों की कीमत भी खुद ही तय कर सकते हैं। दूसरा कानून था -कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020 ,ये कानून कांटेक्ट फार्मिंग से जुड़ा हुआ था , इसमें सरकार का कहना था की किसान बुआई से पहले ही अपनी फसलों को किसी कॉन्ट्रैक्टर के साथ साइन कर सकते थे , इसके लिए उन्हें खरीदारों को जगह जगह ढूंढने की ज़रूरत नहीं होगी और इसमें सबसे अच्छा फायदा ये होगा की जब पहले ही डील फिक्स हो जायेगी तो किसानो को फसलों के नुक्सान या कम दाम की भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं हैं।

वहीँ तीसरा कानून था आवश्यक वस्तुएं संशोधन अधिनियम 2020 ,,इस कानून के अकॉर्डिंग जो व्यापारी था सिर्फ एक ही निश्चित सीमा में कृषि उपज को स्टोर करके रख सकता था , यानी अगर व्यापारी चाहे की वो ज़्यादा से ज़्यादा फसल को स्टॉक करके रखे तो वो ऐसा नहीं कर सकता था , इन तीनो ही कानून के पास करते ही किसानो का गुस्सा बाहर फूट पड़ा क्योंकि जहां सरकार  की नज़र में ये बिल उनके लिए फायदे के सौदे थे वहीँ किसानो को ये घाटे का घर लग रहे थे।

किसानो ने कहा की इससे हमारा भला नहीं होगा ,14  सितम्बर को पार्लियामेंट में अध्यादेश लाया गया ,17 सितम्बर को ये लोकसभा में पास हुआ और 20  सितम्बर को इसे राज्यसभा में भी मंज़ूरी मिल गयी। 24  सितम्बर को पंजाब में किसानो ने इसके खिलाफ तीन दिनों तक रेल रोको अभियान की शुरुआत कर दी लेकिन इस अभियान के चलते भी सरकार ने बिल को लेकर कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई और फिर 25  सितम्बर को आल इंडिया किसान संघर्ष coordination कमेटी ने देश व्यापी आंदोलन की शुरुआत की और 27 सितम्बर को ये तीनो बिल्स राष्ट्रपति के पास पहुंचे और राष्ट्रपति ने भी इन्हे मंज़ूरी दे दी, इस तरह किसानो की नाराज़गी के बाद भी इन बिलों को कानून बना दिया गया।

लेकिन किसान भी इन तीनो कानूनों के खिलाफ डटे रहे और करीब 13 महीनो तक किसानो ने आंदोलन किया, इस बीच इन पर पुलिस प्रशासन ने ना सिर्फ आंसू गैस के गोले फेके बल्कि इन पर लाठी चार्ज भी हुआ। आंदोलन के दौरान कई किसान मारे गए, एक रिपोर्ट के अनुसार बताया गया की करीब 700 किसानो ने अपने हक की लड़ाई में जान गवा दी और आखिरकार नवंबर 2021 में भारत सरकार को ये तीनो कानून वापस लेने पड़े और साथ ही सरकार ने msp की गारंटी देने का भी किसानो से वादा किया।

लेकिन तब से अब तक सरकार ने msp  को लेकर कोई ख़ास कदम नहीं उठाया यहीं वजह हैं की किसानो का आरोप हैं की सरकार ने अपना वादा पूरा नहीं किया हैं , अब चूं की लोक सभा इलेक्शन आने वाले हैं इसलिए किसान चाहते हैं की जल्द से जल्द BJP सरकार अपना वादा पूरा करे और इसलिए 12 फरवरी को किसानो ने दिल्ली चलो आंदोलन की शुरुआत की  और अपने ट्राली ट्रक लेकर दिल्ली की तरफ निकल पड़े, पुलिस ने भी इन्हे रोकने की पूरी कोशिश की और अब किसानो ने हाई वे और हरियाणा पंजाब के बॉर्डर को सील कर दिया हैं यहां सभी किसानो ने रास्ता रोक कर रखा हैं, जिससे लोकल लोगो का आना जाना मुसीबत बन गया हैं और लोकल लोगो को काफी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ रहा हैं।

लेकिन किसानो को इससे भी कोई फर्क नहीं हैं की सरकार को लोगो को हमारे आंदोलन से कितनी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं , किसान तो बस अपनी मांगो को लेकर ज़िद पर अड़े हुए हैं , लेकिन सवाल ये उठता हैं की आखिर इनकी मांगें क्या हैं और ये msp  किसे कहते हैं या क्या होता हैं।

तो सबसे पहले जानते हैं msp  के बारे में , Minimum Support Price (MSP)

ये वो निश्चित कीमत होती हैं जिसके अंडर में सरकार किसानो से खाद पदार्थ  खरीदती हैं ,अब भले ही सरकार जिस दाम पर फसलों को खरीद रही हैं उसकी मार्किट में कीमत कितनी ही क्यों न हो ? यानी msp  में जितनी निर्धारित रेट तय की गयी हैं किसानो को उसी के हिसाब से अपनी फसलें सरकार को बेचनी पड़ती हैं चाहे फिर उन्हें फायदा हो या घाटा।

लेकिन अब किसान MSP को लेकर कुछ कानून बनाने के लिए ज़ोर दे रहे हैं, इसकी वजह हैं की MSP में सरकार ने कहा था की उन्हें 50 फीसदी रिटर्न मिल जाएगा लेकिन कई ऐसे किसान हैं जिन्हे लागत का 50 % profit नहीं मिला बल्कि इन्हे कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ी अब क्योंकि ये एक policy हैं  ना की कानून इसलिए किसान अपने हक के लिए कोई बड़ा कदम भी नहीं उठा सकते हैं जबकि सरकार का कहना हैं की वो ऐसे ही MSP को जारी रखेगी और इन्हे प्रॉफिट का भी यकीन दिलाया जा रहा हैं ?लेकिन किसान इसे कानून के रूप में चाहते हैं और किसानो का कहना हैं की उन्हें लागत का करीब डेढ़ गुना ज़्यादा मिलना चाहिए। किसानो का कहना हैं की सरकार जो कीमत देती हैं उसमें इनकी मज़दूरी तक भी नहीं निकल पाती हैं इसलिए किसान अब लागत से दो गुना ज़्यादा कीमत देने की मांग कर रहे हैं।

msp  के अलावा भी किसानो की बहुत सी मांगें है , जैसे जिन किसानो ने पहले आंदोलन में अपनी जान गवाई थी , उनके घरवालों को मुआवज़ा दिया जाए इतना ही नहीं किसानो की मांग हैं उनके घरवालों में से किसी एक सदस्य को नौकरी भी मिलनी चाहिए। इसके अलावा लखीरपुर खीरी के जिन लोगो के साथ अन्याय हुआ उन्हें इन्साफ मिलना चाहिए ,कृषि , वस्तुओ , दूध उत्पादों , फल ,सब्जियों और मांस पर आयात शुल्क को कम करने के लिए भत्ता बढ़ाया जाए। मनरेगा को बढ़ाया जाए , दिहाड़ी 700  रूपए होनी चाहिए वहीँ साल में करीब 200  दिन का रोज़गार मिलना चाहिए ,नकली बीज , कीटनाशक पदार्थ बनाने वाली कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाये जाएंगे, किसानो को पेंशन दी जाए , बिजली में सब्सिडी मिले, हल्दी मिर्च सुगन्धित फसलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रिय आयोग की स्थापना की जाए। इनके अलावा भी किसानो की बहुत सी मांगे हैं जो सरकार के लिए मानना बहुत मुश्किल साबित हो रही हैं।

लेकिन क्यों ?इसकी वजह हैं बजट , जी हां किसानो की जितनी मांगें हैं उन्हें पूरा करने के लिए सरकार को एक बजट की ज़रूरत  हैं ,जी हां इन मांगो को पूरा करने के लिए सरकार को करीब 10  लाख करोड़ रूपए खर्च करने होंगे ,लेकिन ये तो सिर्फ msp  का हैं अगर इसमें मुफ्त बिजली , सब्सिडी और भी मांगें शामिल की जाए तो ये बजट बैठेगा करीब 36  लाख करोड़ रूपए। अब इतनी बड़ी कीमत किसानो पर खर्च करना नामुमकिन हैं , यहीं वजह हैं की किसानो के आंदोलन गुस्से नाराज़गी के बाद भी सरकार किसानो की सभी मांगें पूरी करने के लिए तैयार नहीं है।

सबसे बड़ी परेशानी है की MSP को सरकार प्रावधान में जोड़ने में काफी मुश्किल महसूस कर रही हैं , क्योंकि सबसे बड़ी समस्या ये हैं की इस कानून का पालन कैसे होगा ?क्योंकि जो MSP  हैं वो फेयर एवरेज क्वालिटी के लिए हैं यानी अगर फसल की अच्छी कीमत हुई तो ही उसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा , अब ऐसे में सरकार ने नियम बना दिया लेकिन फसल की कीमत अच्छी नहीं हुई तो उसका क्या होगा ? क्या फिर भी सरकार को उसे सही कीमत पर खरीदना होगा ?ऐसे में इस कानून पर खरा उतरना मुश्किल होगा ,वहीँ अगर सरकार सभी फसलों को MSP  में जोड़ लेती हैं तो फिर सरकार का बजट ज़्यादा हो जाएगा।

ऐसा नहीं हैं की सरकार किसानो के लिए फिक्रमंद नहीं हैं या फिर उनकी परेशानी को दूर करने की कोशिश नहीं कर रही हैं बल्कि किसानो और सरकार के कुछ मुख्य लोगो के बीच  मीटिंग्स हुई थी जिनका कोई नतीजा नहीं निकला लेकिन तीसरी मीटिंग 18  फरवरी को काफी शान्ति पूर्ण हुई, इसमें 13 -14  मांगो पर सकारात्मक चर्चा हुई लेकिन msp  और कई मांगों पर कोई बातचीत नहीं हुई। इसलिए किसानो ने फिर से पंजाब और हरियाणा के बीच सीमाओ पर अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखा और दूसरी मांगो के अलावा फसल की न्यूनतम कीमत बढ़ाने और क़र्ज़ माफ़ करने की भी मांग की हैं। किसानो ने आंदोलन को 29  फरवरी तक टाल दिया हैं और आने वाले दिनों में किसान अपना फैसला सुनाएंगे और अलग अलग राज्यों में तबाही भी मचाने का प्लान बना चुके हैं।

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