1857 में तीन महीने के लिए भारत की स्वतंत्रता | India’s Independence for Three months in 1857

Indian Independence for Three month in 1857

              आज हम हमारे देश के इतिहास के एक बहुत महत्वपूर्ण पहलु पर चर्चा करेंगे  और इसके साथ ही शासन के दौरान हुई 1857 की क्रांति के बारे में जानेंगे।

              1857 की क्रांति को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से भी जाना जाता हैं और यह नाम वीर सावरकर द्वारा दिया गया था। यह पेहला स्वतंत्रता संग्राम था क्योंकि इसमें पेहली बार भारतीय नागरिकों ने अंग्रेजों के कार्यों का विरोध किया। 1857 के विद्रोह के समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग थे। समय के साथ ही इस विद्रोह का समर्थन हर जगह होने लगा था और इसी के साथ हैदराबाद की रियासत ने भी इस क्रांति को अपना समर्थन दिया।

              1857 विद्रोह का प्रारंभ मेरठ से हुआ था। इस विद्रोह में सबसे पहले व्यक्ति जिन्होंने इसके लिए अपना बलिदान दिया उनका नाम मंगल पाण्डे था। 1857 में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बगावत करने के लिए ही मुख्य रूप से अवध रेजिमेंट खड़ी हुई।               

              सन 1857 का विद्रोह उत्तरी और मध्य भारत में ब्रिटिश शासन के विरोध में हमारे सेना के असंतोष का परिणाम था| सैनिकों के असंतोष की वजह से कई सारी घटनाएँ जैसे- छावनी क्षेत्र में आग लगना आदि जनवरी से ही शुरू हो गयी थीं लेकिन बाद में मई में इन घटनाओं ने अपने आस पास के छेत्रो में आन्दोलन और विद्रोह का रूप ले लिया|

              यही वो विद्रोह  था जिसने भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के शासन को समाप्त कर दिया और अगले 90 वर्षों के लिए भारतीय द्वीप के आधे से ज़्यादे भाग को ब्रिटिश सरकार  के  शासन के अधीन लाने का रास्ता तैयार कर दिया|

              इसके बाद इन यूरोपीय कंपनियों में से अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में सबसे ज़्यदा नामी और फेमस कंपनी हो गयी और इसी कंपनी ने भारत के अलग-अलग क्षेत्रों पर कब्ज़ा भी करना शुरू कर दिया था।

आइये जानते हैं कि इस विद्रोह का कारण क्या था –

विद्रोह के कारण

              अगर कुछ सैनिकों कि बात करे तो उनके द्वारा उठाये गए कुछ मुद्दे और चर्बीयुक्त कारतूसों के प्रयोग को इस विद्रोह का मुख्य कारण माना गया लेकिन वर्त्तमान शोध से यह पाता लगाया जा सकता है  कि कारतूसों का प्रयोग न तो विद्रोह का एकमात्र कारण था और न ही मुख्य कारण | वास्तव में यह विद्रोह सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक आदि अनेक कारणों का मिला जुला परिणाम था|

              तो चलिए अब इस विद्रोह के इन्ही कुछ सामाजिक और धार्मिक, आर्थिक,सैन्य और राजनीतिक –चार मुख्य कारणों के बारे में चर्चा करते हैं।

 सामजिक और धार्मिक कारण

              ब्रिटिशों ने भारतीयों के सामाजिक और धार्मिक जीवन में दखल न देने की नीति से हटकर सती-प्रथा उन्मूलन (1829) और हिन्दू-विधवा पुनर्विवाह(1856) जैसे अधिनियम शुरू किये | इसके साथ ही ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रवेश करने और धर्म प्रचार करने की अनुमति प्रदान कि और 1950 ई. के धार्मिक अयोग्यता अधिनियम के द्वारा हिन्दुओं के कई सारे कानूनों में बदलाव किये गए |

              इस अधिनियम का मतलब ये था कि इसके अनुसार धर्म परिवर्तन करने के कारण किसी भी पुत्र को उसके पिता की संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकेगा|

आर्थिक कारण:

              ब्रिटिश शासन ने ग्रामीण आत्मनिर्भरता को समाप्त कर दिया था | और कृषि के छेत्र में अलगाव  के कारण  कृषक-वर्ग पर काफी बोझ बढ़ा दिया था | इसके अलावा  व्यापार नीति को अपनाने,उद्योगों की स्थापना करने और धन के एक्सपोर्ट फैक्टर आदि कारणों ने अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट कर दिया|

अर्थव्यवस्था के विनाश ने भारतीय उद्योगों को भी नष्ट कर दिया। देश के पारंपरिक ताने-बाने को तोड़ दिया। इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति ने मशीनों को भारतीय कच्चे माल का शत्रु बना दिया और देश के विदेश व्यापार को नष्ट कर दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत केवल कच्चे माल का एक्सपोर्टर बनकर ही रह गया था। तो ये था इस विद्रोह का आर्थिक कारण। जिसने इस विद्रोह को और बढ़ावा दिया।अब अगले कारण को जानते हैं 

सैन्य कारण

              भारत में ब्रिटिश  व्यापार के विस्तार ने सिपाहियों की नौकरी की परिस्थितियों को बुरी तरह से प्रभावित किया |उन्हें बगैर किसी एक्स्ट्रा इनकम के भुगतान के अपने घरों से दूर नियुक्तियां प्रदान की जाती थीं|

              सैन्य असंतोष का महत्वपूर्ण कारण जनरल सर्विस एन्लिस्टमेंट एक्ट ,1856 था,जिसके द्वारा सिपाहियों को आवश्यकता पड़ने पर समुद्र तक पार करने को कहा गया | 1954 के डाक कार्यालय के नियम द्वारा सिपाहियों को मिलने वाली मुफ्त डाक सुविधा भी वापस ले ली गयी|

              इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार में भारतीय सैनिकों की कमी यानी ब्रिटिश सरकार के समय भारतीयों को सैनिक सेवा में भाग लेने के अधिकार में कटौती की जाती थी जिससे नागरिकों में सरकार के खिलाफ हीन भावना का विकास हो रहा था। और अंततः इसी भावना ने उनके खिलाफ विद्रोह का रूप ले लिया था।

अब जानते हैं इस विद्रोह के अगले कारण को 

राजनीतिक कारण

              भारत में ब्रिटिश क्षेत्र का अंतिम रूप से विस्तार डलहौजी के शासन काल में हुआ था| डलहौजी ने 1849 ई. में घोषणा की कि बहादुरशाह द्वितीय के उत्तराधिकारियों को लाल किला छोड़ना होगा| बाघट और उदयपुर के बीच हुए एग्रीमेंट को किसी भी तरह से रद्द कर दिया गया था।

 जब डलहौजी ने करौली (राजस्थान) पर अपने सिद्धांत को लागू करने की कोशिश की तो उसके निर्णय को कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स द्वारा निरस्त कर दिया गया।

              लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति जिसमें वह सभी रियासतों पर अपना अधिकार जमाना  चाहता था। अवध और अन्य राज्यों को ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत शामिल करना एवं ईस्ट इंडिया कंपनी की विस्तारवादी नीति इस विद्रोह के प्रमुख कारण थे।

              इन कारणों के साथ ही देशभक्त सेनानियों ने ब्रिटिश सरकार के सामने अपने विद्रोह की चुनौती बहुत बड़े स्तर पर खड़ी की थी। आपको ये जान कर भी हैरानी होगी कि अंग्रेज सरकार इससे बुरी तरह डर और घबरा भी गए थे।

              और इसी डर के चलते ब्रिटिश हुकूमत ने इस क्रांति को   दबाने की पूरी कोशिश भी की। भले ही इस क्रांति ने अंग्रेजों को जड़ से नहीं उखाड़ फेंका हो, लेकिन इसके बीज इसी स्वतंत्रता संग्राम से पड़ना शुरू हो गए थे।    

              हालांकि अंग्रेजों ने इस क्रांति से सबक भी खूब लिया और हर एक वो कोशिश की, ताकि अंग्रेज हमेशा अपना राज चलाते रहें। यही वजह थी कि 1857 की क्रांति से डरे ब्रिटिशर्स को शासन में कई बदलाव करने पड़े।

              इतना ही नहीं ब्रिटिश सरकार ने तो  1857 की क्रांति को असफल तक बताने की साजिशें शुरू कर दीं। इससे भी चैन नहीं मिला तो उन्होंने तुरंत ही शिक्षा और बौद्धिक जगत में इन बातों को अफवाहों के रूप में सबके समक्ष पेश करवाना शुरू कर दिया था।

              उनका कहना था कि यह महज एक सिपाही विद्रोह था जो अचानक और बिना किसी योजना के सिर्फ चर्बी वाले कारतूसों के कारण शुरू हुआ। इसके साथ ही उनका कहना था कि – यह  विद्राह केवल उत्तर भारत में हुआ। और कुछ राजे-रजवाड़े ही विद्रोह में शामिल हुए।  क्योंकि वो सभी अपना राज छिन जाने के कारण नाखुश थे।

              फिर उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज फिर से भारत में शासन हासिल करने के लिए इसमें शामिल हुआ।  वे अपनी इस योजना में कुछ हद तक सफल भी हुए क्योंकि इन सब अफवाहों और झूठों को आजादी के बाद भी सारे जगत में सच मना जाता रहा।

पर समय के साथ ही फिर इस पर बहस शुरू हुई। और भला सच्चाई कब तक छिपी रह सकती है। बाद में देर-सबेर इसका सच भी लोगों के सामने आने ही लगा।

              तो 1857 का यह विद्रोह भारतीय इतिहास की एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना थी | हालाँकि इसकी शुरुआत सैनिको के विद्रोह द्वारा हुआ था लेकिन यह विद्रोह कम्पनी के प्रशासन से असंतुष्ट और विदेशी शासन को नापसंद करने वालों की शिकायतों व समस्याओं का ही परिणाम था।

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