Kargil War – The Operation Vijay | कारगिल युद्ध कैसे जीता भारत

Kargil War - The Operation Vijay

          भारत वीर योद्धाओं की भूमि है। भारत ने हमेशा कड़ा संघर्ष किया है और दुश्मनों को हमेशा धूल चटाई है। इसका एक ठोस उदाहरण कारगिल युद्ध के रूप में देखा जा सकता है।

          आज हम भारत और उसके इतिहास और परंपराओं से जुड़ी नही नई कहानियां लेकर आते रहते है, आज हम आपको कारगिल विजय दिवस(Kargil Vijay diwas) के कुछ मजेदार फैक्ट्स के साथ साथ कारगिल युद्ध की कहानी को भी समझाएंगे।

          कारगिल में भारत(Bharat) को पाकिस्तान(Pakistan) के खिलाफ युद्ध जीते 23 साल पूरे होने वाले हैं। इस उपलब्धि पर भारत हर साल कारगिल विजय दिवस मनाता है। भारतीय सशस्त्र बल के सैनिकों ने हजारों फिट की ऊंचाई पर पाकिस्तानी सेना को खदेड़ा और अपनी जमीन उनके कब्जे से वापस ली। साल 1999 में जब हमने पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल युद्ध जीता था, तब दुनिया ने भारतीय सेना की बहादुरी की गाथा गाई थी।

          देश की इस जीत का जश्न मनाने के लिए पूरे भारत में हर साल कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। कारगिल युद्धक्षेत्र दुनिया के सबसे ऊंचे और खतरनाक युद्धक्षेत्रों में से एक है। ये लड़ाई  श्रीनगर(Srinagar) से 205 किमी दूर कारगिल शहर में स्थित टाइगर हिल क्षेत्र(Tiger Hill Area) में लड़ी गई थी। यहां की रातें लंबी होती हैं और तापमान -48 डिग्री सेल्सियस(Degree Celsius) तक गिर जाता था। पाकिस्तानी सेना लद्दाख(Ladakh) और कश्मीर(Kashmir) के बीच संबंध तोड़ना चाहती थी और बाद में धीरे-धीरे कश्मीर पर कब्जा करना चाहती थी।

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          1998-99 की सर्दियों के दौरान, पाकिस्तानी सेना ने गुप्त रूप से सियाचिन ग्लेशियर(Siachen Glacier) पर दावा करने के लक्ष्य के साथ इस क्षेत्र पर हावी होने के लिए कारगिल के पास सैनिकों को ट्रेनिंग देना और भेजना शुरू कर दिया।

          पाकिस्तानी सेना ने कहा कि वे पाकिस्तानी सैनिक नहीं बल्कि मुजाहिदीन थे। पाकिस्तानी सैनिकों और अर्धसैनिक बलों को कुछ कथित तौर पर मुजाहिद्दीन के आड़ में भारतीय पक्ष के इलाके की नियंत्रण रेखा में घुसपैठ करा दिया गया।घुसपैठ के कोड का नाम “ऑपरेशन बद्र”(Operation Badr) था।

          पाकिस्तान का यह भी मानना ​​था कि इस क्षेत्र में कोई भी तनाव कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीयकरण करेगा जिससे शीघ्र ही इसका समाधान निकलेगा। फिर भी एक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए भारतीय प्रशासित कश्मीर में एक दशक से लंबे विद्रोह के मनोबल को बढ़ावा देने का एक लक्ष्य हो सकता था।

          घुसपैठ की सीमा क्षेत्र में भारतीय सैनिकों ने मान लिया था कि घुसपैठिये जिहादी थे, और दावा किया कि वे कुछ दिनों के भीतर ही उन्हें देश से बाहर कर देंगे। एलओसी के साथ कहीं और भी रणनीतियाँ  घुसपैठियों द्वारा नियुक्त की गई थी, तब भारतीय सेना को महसूस हुआ कि इस हमले की योजना बहुत बड़े पैमाने पर बनाई गई थी। बाद में पता चला कि इसमें कश्मीरी आतंकी भी शामिल थे।

          युद्ध का मैदान ऊंचाई पर था; इसलिए, इसने भारतीयों के लिए हथियार और अन्य सामग्री ले जाने के लिए एक लॉजिकल प्रोब्लम पैदा कर दी थी। पाकिस्तानी सैनिकों ने शुरू में नियंत्रण रेखा(Line Of Control, LOC)को पार किया जिसे एलओसी कहा जाता है और भारत-नियंत्रित क्षेत्र में प्रवेश किया। बाद में स्थानीय चरवाहों ने एलओसी पार करने वाले संदिग्ध लोगों के बारे में सेना को सतर्क कर दिया।

          गहराई से देखने के लिए, भारतीय सेना ने लद्दाख से अतिरिक्त सैनिकों को कारगिल क्षेत्र में भेजा और उन्हें पता चला कि पाकिस्तानी सेना ने एलओसी पार कर भारत नियंत्रित क्षेत्र में प्रवेश किया है। दोनों सिपाहियों ने जमीन पर अपना कब्जा जमाने के लिए फायरिंग शुरू कर दी। बाद में भारतीय वायु सेना घाटी से सभी घुसपैठियों को साफ करने के लिए युद्ध में शामिल हुई।

          भारतीय सेना के बढ़ते हमले और तत्कालीन संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन(President Bill Clinton) के दबाव के बाद, पाकिस्तान ने एलओसी क्षेत्र से अपने सैनिकों को वापस ले लिया। भारतीय सेना ने उन सभी चौकियों पर फिर से कब्जा कर लिया, जिन पर पाकिस्तानी सेना जीतने की कोशिश कर रही थी। यह दो महीने का लंबा युद्ध 26 जुलाई 1999 को समाप्त हुआ जब 200,000 भारतीय सैनिकों की एक गठजोड़ के साथ भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय का जवाब दिया।

          पाकिस्तानी सेना ने घोषणा की कि उन्होंने विवादित क्षेत्र से अपनी सेना वापस ले ली है। इस ऑपरेशन को ऑपरेशन विजय नाम दिया गया था। कैप्टन विक्रम बत्रा(Captain Vikram Batra), मेजर जनरल इयान कार्डोजो(Major General Eyan Cardozo) के साथ भारतीय सेना ने 26 जुलाई 1999 को उस चौकी पर बहादुरी से लड़ाई लड़ी, जिस पर पाकिस्तान का डोमिनेंस था।

          Line Of Control की संहिता का सम्मान नहीं करने और विवादित क्षेत्र पर नियंत्रण करने की कोशिश करने के लिए पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी आलोचना हुई थी। एलओसी का सम्मान करने और युद्ध को सफलतापूर्वक लड़ने के लिए सभी देशों ने भारत की प्रशंसा की। इसलिए हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भारत के प्रधानमंत्री(Prime Minister) अमर जवान ज्योति(Amar Jawan Jyoti) पर सभी शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं। 

          इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा जवान घायल हुए थे, जिनमें से अधिकतर सैनिक अपने जीवन की 30 वर्ष की आयू भी नही लांघ पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का बखान किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के सामने लेता है। इन रण के योद्धाओं ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था।

          वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था। 

          हम हर जगह देशभक्ति महसूस करते हैं। शहीदों और भारतीय सेना की शक्ति को श्रद्धांजलि देते हुए सेना के जवान स्टंट और परेड भी करते है। कारगिल विजय दीवस को द्रास-कारगिल सेक्टर के भारतीय सैनिक और दिल्ली मे इंडिया गेट तथा अमर जवान ज्योति मे बहुत ही उत्साह और जोश के साथ मनाया जाता है। साथ ही देश के अन्य सैन्य टुकड़ियाँ भी बहुत ही उत्साह के साथ इस दिन को मानते हैं।

          नया सिर्फ सैनिक बल्कि अन्य लोग भी इस दिन सोशल मीडिया पर अपनी देश भक्ति जाहीर करते है और आस-पास मे भारतीय सनिकों के सम्मान मे रैली और भाषण कार्यक्रम आयोजित करते हैं जिसमे मुख्य अतिथि के रूप में वे रिटायर्ड सेना के जवानों को निमंत्रण देते हैं। वे सेना के जवान लोगों को भारतीय सेना का महत्व और कुछ मुख्य युद्ध सफलताओं के बारे मे बताते हैं।

          हर साल की तरह इस साल भी पूरा देश 26 जुलाई के दिन कारगिल विजय दिवस को देशभक्ति की पूरी निष्ठा से मनाएगा, स्कूल्स और गवर्नमेंट ऑफिसेज में 26 जुलाई के दिन झंडा रोहन होता हैं सभी लोग नेशनल एंथम साथ में गाने के बाद शहीदों को याद में कुछ देर का मौन भी धारण करते है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि हमारे आगे आने वाली पीढ़ी को इस बलिदान की छवि हमेशा याद रहे और हमारी सेना के शाहिद जवान अपने देशवासियों के दिलो में सदा अमर रहे।

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