राम मंदिर आंदोलन में भाजपा की भूमिका

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क्या 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा नहीं बल्कि भाजपा का आगामी चुनाव  के लिए राजनीतिक एजेंडा सामने आया है? राम मंदिर आंदोलन किस तरह रहा भाजपा के लिए वरदान? आखिर कैसे 1984 में सिर्फ दो सीटों से जीतने वाली भाजपा आज बहुमत से सत्ता पर काबिज है? पालमपुर सम्मेलन में ऐसा क्या फैसला किया भाजपा ने जो पार्टी ने जीत का झंडा फहरा दिया? कौन है भाजपा की तरफ से कट्टरवादी हिंदू नेता और ऐसा उन्होंने क्या किया कि भाजपा को फायदा ही फायदा हुआ? क्या सच में राम मंदिर निर्माण कार्य बीजेपी का टिकट to Upcoming इलेक्शन है? कैसे राम मंदिर आंदोलन ने भाजपा को दिया समर्थन अगर आप ही जानना चाहते हैं तो वीडियो में लास्ट तक बन रहे। 

22 जनवरी 2024 को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी है। पूरे भारतवर्ष में राम मंदिर की गूंज है हर तरफ जय श्री राम जय जय श्री राम के जय कारें गूंज रहे हैं लेकिन अगर कहा जाए की राम मंदिर आंदोलन और राम मंदिर निर्माण भाजपा के लिए वरदान साबित हुआ है तो यह कुछ गलत नहीं होगा, क्योंकि 1984 में सिर्फ दो सीटें पाने वाली भाजपा ने रफ्तार तभी पकड़ी जब राम मंदिर की तरफ रुख किया और वही 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए टिकट To 2024 इलेक्शन माना जा रहा है यानी कहीं ना कहीं आने वाले चुनाव में PM नरेंद्र मोदी ने अपने वोटर पक्के कर लिए हैं। 

और ऐसा हमारा नहीं बल्कि विपक्षी नेताओं का कहना है उनका कहना है कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को लेकर राजनीति जोरों-शोरों से चल रही है विपक्षियों की माने तो भाजपा धर्म के इस मामले में भी राजनीति कर रही है, कांग्रेस पार्टी के सीनियर नेताओं ने तो प्राण प्रतिष्ठा का न्योता तक ठुकरा दिया,, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की और चुनाव के दौरान भाजपा नेता भी राम मंदिर का क्रेडिट लेने से चूकते नहीं है। 

लेकिन बीजेपी के लिए राम मंदिर आंदोलन वरदान किस तरह रहा?यह समझने के लिए हमें इतिहास में पीछे जाना होगा। 

भाजपा यानी भारतीय जनता पार्टी का जन्म साल 1980 में हुआ था, वही राम मंदिर का मुद्दा आजादी के 2 साल बाद ही हिंदू महासभा द्वारा उठा दिया गया था, हिंदू महासभा ने 14 अगस्त 1949 को एक प्रस्ताव पास किया जिसमें कहा गया कि राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए। इस प्रस्ताव को पास हुए लगभग तीन दशक गुजर गए इस बीच 1980 में भाजपा का गठन भी हो गया ,इसके बाद विश्व हिंदू परिषद राम मंदिर को लेकर एक्टिव हुआ और 1984 में धर्म संसद का आयोजन किया गया। 

इस धर्म संसद में कहा गया था कि अयोध्या में राम मंदिर, मथुरा में कृष्ण मंदिर और वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए आंदोलन चलाना चाहिए यह तीनों मंदिर बनने ही चाहिए, अब यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि विश्व हिंदू परिषद के इस फैसले पर उस समय कांग्रेस भी समर्थन में थी जबकि बीजेपी BJP इसे कुछ खास सपोर्ट करती नजर नहीं आ रही थी, इसी साल 1984 में लोकसभा चुनाव भी हुए जिसमें भाजपा भी दावेदारी पेश करती नजर आई। 

हालांकि चुनाव से कुछ महीने पहले विश्व हिंदू परिषद VHP और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी कि आरएसएस RSS ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर मुहिम छेड़ी थी लेकिन उसमें बीजेपी की उदासीनता भारी पड़ गई और चुनाव में भाजपा को कुछ खास फायदा नहीं मिला, इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को बुरी तरह से शिकस्त मिली और उसके मेजर्ली दो ही कारण थे, पहला तो राम मंदिर आंदोलन की तरफ उदासीनता और दूसरा इंदिरा गांधी की हत्या ,जी हां 1984 ही वह साल था जब इंदिरा गांधी को उनके ही गार्ड्स द्वारा गोलियों से छलनी कर दिया गया, जिसका पूरा समर्थन या कहें सहानुभूति राजीव गांधी को मिली और कांग्रेस प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई।

वहीं बीजेपी BJP को सिर्फ दो ही सीटें मिलीं जिसमें से एक तो गुजरात के मेहसाणा की थी। 1984 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा को महज दो सीटें मिलीं तो संघ ने एक बैठक बुलाई। इसके बाद तय किया गया कि गांधीवादी विचारधारा के सहारे भाजपा राजनीति में कमाल नहीं कर सकती, इसीलिए सिर्फ गुजरात तक फैले राम मंदिर आंदोलन को भाजपा ने चिंगारी दिखाने का काम किया और यह आग बढ़ते बढ़ते पूरे देश में फैल गई। 

इसके बाद राजीव गांधी शाहबानो केस में फंस गए और 1987 में भाजपा ने अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में कमाल कर दिखाया, यहां अटल बिहारी वाजपेई की बापू नगर में हुई रैली को आज भी याद किया जाता है, इस रैली में उन्होंने भाजपा को साफ सफाई का काम देने की मांग की थी, इन चुनावों में जब नतीजे आए तो भाजपा लोगों के दिलों पर खरी उतरी और पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पकड़ी। 

इसके ठीक 2 साल बाद यानी 1989 में भाजपा ने पालमपुर में सम्मेलन रखा जिसे आज भी याद किया जाता है क्योंकि पालनपुर सम्मेलन में पार्टी ने यह तय किया कि इसका मुख्य राजनीतिक एजेंडा राम जन्मभूमि को मुक्त करवा कर विवादित स्थल पर भव्य राम मंदिर बनवाना होगा, यहां से लालकृष्ण आडवाणी हिंदुत्व के ख़ास चेहरे बन गए क्योंकि इसके ठीक अगले साल यानी 1990 में लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी रथ यात्रा गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक शुरू की। 

लाल कृष्ण आडवाणी की इस रथ यात्रा को आज भी याद किया जाता है जिसने भाजपा को राजनीति में काफी मजबूती प्रदान की थी क्योंकि उस समय केंद्र, उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस सहित सपा ढलान पर थी, बीपी सिंह लेफ्ट और राइट दोनों के समर्थन से पीएम PM थे और भाजपा के अब 85 लोकसभा सांसद थे।

दरअसल 1989 में हुए चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में पहली बार यह ऐलान किया था कि भारतीय जनता पार्टी राम मंदिर का निर्माण करवाएगी, उनके घोषणा पत्र में बाकायदा राम मंदिर निर्माण लिखा हुआ था, हिंदुत्व की तरफ भाजपा के इस रुख का नतीजा यह हुआ की 1984 में महज़ दो सीटें जीतने वाली भाजपा को 1989 में 85 सीटें मिली, इतनी सीटों को देखकर भाजपा का रुख भी राम मंदिर निर्माण की तरफ बढ़ने लगा और इस वक्त पार्टी के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी जी ही थे जिन्हें कट्टर हिंदूवादी माना जाता था इसीलिए हिंदुओं का रुख भी भाजपा की ओर बढ़ने लगा। 

हिंदूवादियों का रुख भाजपा और लाल कृष्ण आडवाणी की तरफ 1990 में सोमनाथ से शुरू हुई अयोध्या के लिए रथ यात्रा को लेकर और ज्यादा बढ़ गया, हालांकि उत्तर प्रदेश के मुखिया लालू यादव ने लाल कृष्ण आडवाणी को बिहार पहुंचते ही गिरफ्तार करने के आदेश दिए और हुआ भी कुछ ऐसा ही, लाल कृष्ण आडवाणी जी को गिरफ्तार कर लिया गया और रथ यात्रा वहीं रुक गई, क्योंकि इस दौरान राम भक्तों के लिए बस ट्रक सहित दूसरे बड़े वाहनों को भी बंद कर दिया गया था लेकिन कार सेवकों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा और कार सेवक बड़ी आसानी से अयोध्या में राम मंदिर तक पहुंच गए। 

लालू प्रसाद यादव के कहने पर कार सेवकों पर लाठी डंडे सहित गोलियां बरसाई गई,जिस वजह से लालू यादव को काफी कुछ सुनना पड़ा लेकिन बाद में उन्होंने अपने बयान में कहा कि यह जरूरी था, हालांकि यहां से भाजपा की कमर बहुत मजबूत होती चली गई क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा से हिंदूवादी हिंदुत्व के संगठन उनसे जुड़ने लगे और हिंदुओं की विचारधारा भी भाजपा अब अपना चुकी थी इसीलिए आज भी भाजपा को हिंदुत्व की पार्टी कहा जाता है।

1991 में जब मुख्यमंत्री चुनाव हुए तो उसमें बीजेपी को 121 सीटों पर जीत मिली और पहली बार उत्तर प्रदेश में पार्टी सत्ता में आ गई और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बन गए। इसके बाद आया 1992 जब बाबरी मस्जिद के ढांचे को गिरा दिया गया और यह एक गलत कदम भाजपा के लिए काफी नुकसानदायक रहा क्योंकि बाबरी मस्जिद के हिंदूवादियों द्वारा गिराए जाने के बाद 1996 से लेकर 2019 तक ऐसा कोई लोकसभा चुनाव नहीं रहा जब राम मंदिर के मुद्दे को भाजपा ने घोषणा पत्र में जगह न दी हो, हालांकि इन चुनाव में भाजपा को कुछ बैकवर्ड भी देखना पड़ा और साल 2004 के चुनाव में गठबंधन के दलों को संतुष्ट करने और राम मंदिर की जरूरत महसूस न होने की वजह से भाजपा ने अपना नारा ही बदल दिया, अब भाजपा विकास के मुद्दे पर लड़ रही थी जिस वजह से 2004 में उसे हार का सामना करना पड़ा जहां भाजपा को हार का सामना करना पड़ा वहीं कांग्रेस एक बार फिर सत्ता पर काबिज हुई।।

लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में फिर से विकास और भ्रष्टाचार उन्मूलन का मुद्दा जनता के सामने रखा गया और एक बार फिर भाजपा पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता में आई और केंद्र में बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए और भाजपा सरकार। इसके बाद से ही भाजपा ने लगातार राम मंदिर के लिए काम किया और आलम यह हुआ की 2019 के चुनाव के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर का फैसला सुना दिया और इस ऐतिहासिक जंग को हमेशा हमेशा के लिए शांत कर दिया। 

इसके बाद 2020 में नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर का शिलान्यास किया और 22 जनवरी 2024 को उनके हाथो राम मंदिर में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई और अब आने वाले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 400 प्लस सीटों का सपना संजो रही है इसीलिए विपक्षी कह रहे हैं कि यह राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक एजेंडा है जो वह आगे आने वाले चुनाव के लिए चल रही है। 

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